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डायबिटीज की आयुर्वेदिक दवा, जड़ी बूटी और औषधि

डायबिटीज की आयुर्वेदिक जड़ी बूटी और औषधि

  • आमलकी
    • यह जड़ी बूटी ऊर्जादायक और तीनों दोषों को साफ करने वाली है। 
    • यह कई बीमारियों के इलाज में उपयोगी है जैसे डायबिटीज जो कि अधिक संख्या में लोगों को प्रभावित करती है। बच्चे, वयस्क और बुजुर्ग सभी इस बीमारी से ग्रस्त हो सकते हैं। गर्भवती महिलाओं में इसका इस्तेमाल सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
    • पित्त दोष वाले व्यक्ति में आमलकी के हानिकारक प्रभाव के रूप में दस्त की समस्या हो सकती है।
       
  • गुड़मार
    • गुड़मार का मतलब है शर्करा को खत्म करने वाला। इस जड़ी-बूटी की जड़ों और पत्तों का इस्तेमाल डायबिटीज मेलिटस के इलाज में किया जाता है। रिसर्च में सामने आया है कि यह खट्टे-मीठे घोल में से मीठापन निकाल देती है और मीठा खाने की चाहत को भी कम करती है। गुड़मार से पैन्क्रियाज की कार्यक्षमता में भी सुधार आता है।
    • ​डायबिटीज मेलिटस के इलाज में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख जड़ी बूटियों में गुड़मार भी शामिल है। इसकी पत्तियां हृदय उत्तेजित करती हैं, इसलिए हृदय रोगियों को ये जड़ी बूटी देते समय सावधानी बरतनी चाहिए।
       
  • करावेल्लका 
    • चूंकि ये रक्तशोधक (खून साफ करने वाली) है इसलिए मधुमेह के इलाज के लिए इसे बेहतरीन माना जाता है। इसमें विटामिन सी प्रचुर मात्रा में होता है और ये वजन घटाने की क्षमता रखती है। 
    • डायबिटीज के इलाज में हर व्यक्ति पर ये जड़ी-बूटी अलग तरह से असर करती है। किसी अनुभवी चिकित्सक की देखरेख में ही इस जड़ी बूटी का इस्तेमाल करना चाहिए।
       
  • गुडूची
    • परिसंचरण और पाचन तंत्र के विकारों के इलाज में गिलोय की जड़ और तने का इस्तेमाल किया जाता है।
    • यह कड़वे टॉनिक की तरह काम करती है और इसमें शर्करा को कम करने की क्षमता है इसलिए यह डायबिटीज मेलिटस के उपचार में भी उपयोगी है।
       
  • मेथी
    • प्राचीन समय से ऊर्जादायक और उत्तेजक के रूप में मेथी का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसे मधुमेह के उपचार के लिए जाना जाता है।
    • व्यक्ति की चिकित्सकीय स्थिति के आधार पर इस जड़ी बूटी की सलाह दी जाती है। गर्भवती महिलाओं में इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

मधुमेह के लिए आयुर्वेदिक दवाएं

  • फलत्रिकादी क्वाथ
    • इस काढ़े को समान मात्रा में आमलकी, हरीतकी और विभीतकी के साथ दारूहरिद्र के तने, इंद्रायण की जड़ और नागरमोथा से तैयार किया गया है।
    • ये भोजन के पाचन और भोज्य पदार्थों को तोड़कर उनके उचित अवशोषण में सुधार कर सभी प्रकार के डायबिटीज के इलाज में उपयोगी है। यह ओषधि शरीर से न पचने वाले भोजन और तत्वों को भी बाहर निकालने में मदद करती है।
       
  • कतकखदिरादि कषाय
    • कतकखदिरादि कषाय एक हर्बल काढ़ा है जिसमें एक समान मात्रा में  कटक, खदिरा, आमलकी, दारुहरिद्र, हरिद्रा, अभय और आम के बीज आदि जैसी जड़ी-बूटियां मौजूद हैं।
    • इस कषाय में एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं। यह वात और पित्त दोनों ही दोषों से संबंधित रोगों को नियंत्रित करता है। यह मधुमेह और डायबिटिक न्यूरोपैथी के उपचार में उपयोगी है।
       
  • निशा कतकादिकषाय
    • इसमें 12 जड़ी बूटियां जैसे कि कटक, खदिरा, आमलकी, वैरी, दारुहरिद्र, समंग, विदुला, हरिद्रा, पधि, आम के बीज, हरीतकी और नागरमोथा मौजूद हैं।
    • ये कषाय डायबिटीज के लक्षणों जैसे कि थकान, हाथों और पैरों में जलन, अत्‍यधिक प्‍यास लगना और बार-बार पेशाब आने से राहत दिलाता है। कुल मिलाकर ये जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाता है और डायबिटीज मेलिटस को नियंत्रित करने में असरकारी है। इसे अकेले या यशद भस्‍म (जिंक ऑक्‍साइड पाउडर) के साथ इस्‍तेमाल किया जाता है।
       
  • निशा-आमलकी
    • ये हल्‍दी और आंवला का मिश्रण है जिसकी सलाह आयुर्वेद में डायबिटीज के इलाज के लिए दी जातीहै। आमलकी के रस और हल्‍दी पाउडर की 1:0.5 की मात्रा में मिलाकर इसे तैयार किया जाता है।
    • इस मिश्रण से डायबिटीज में होने वाली विभिन्‍न समस्‍याओं जैसे कि डायबिटिक न्‍यूरोपैथी, नेफ्रोपैथी, रेटिनोपैथी, गैस्‍ट्रोपैथी और एथेरोस्क्लेरोसिस (धमनियों में रुकावट) को रोकने एवं नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
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डायबिटीज (मधुमेह) का आयुर्वेदिक उपचार

  • उद्वर्तन
    • इस विधि में विशेष औषधीय पाउडर से मालिश की जाती है जिसमें प्रभावित व्यक्ति के सारे दोषों को संतुलित करने वाली जड़ी-बूटियों के मिश्रण का इस्तेमाल किया जाता है।
    • पाउडर को उपचार से पहले गर्म किया जाता है। उसके बाद इससे प्रभावित हिस्से की नीचे से ऊपर की ओर गहराई से मालिश की जाती है।
    • यह प्रक्रिया 45 से 60 मिनट तक चलती है। इसके बाद मरीज आधा घंटा आराम करके स्नान कर सकता है।
    • यह कफ दोष और शरीर में जमा अतिरिक्त चर्बी को कम करके मधुमेह का उपचार करती है।
       
  • धान्य अम्ल धारा
    • इसमें गर्म औषधीय तरल को प्रभावित हिस्से या पूरे शरीर पर डाला जाता है। धारा चिकित्सा दो प्रकार की होती है- परिषेक (शरीर के किसी विशेष भाग पर औषधीय तरल या तेल डालना) और अवगाहन (औषधीय काढ़े से भरे टब में बैठना)।
    • धान्य अम्ल में धान्य (अनाज) और अम्ल (सिरका) से गुनगुना औषधीय तरल तैयार किया जाता है। यह कफ और वात दोष को संतुलित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
       
  • सर्वाग अभ्यंग और स्वेदन
    • सर्वाग अभ्यंग तेल को पूरे शरीर पर डालने और मसाज करने की एक प्रक्रिया है। यह शरीर की लसिका प्रणाली को उत्तेजित करती है, जो कि कोशिकाओं को पोषण की आपूर्ति और शरीर से जहरीले तत्व निकालने का काम करती है।
    • तेल मालिश के बाद स्वेदन (पसीना लेन की विधि) के जरिए शरीर से अमा (विषैले पदार्थ) को प्रभावी तरीके से पूरी तरह से बाहर करने का काम किया जाता है। 
    • स्वेदन से शरीर की सभी नाड़ियां खुल जाती हैं और विषैले तत्व रक्त से निकलकर जठरांत्र मार्ग में आ जाते हैं। यहां से विषाक्त पदार्थों को आसानी से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
    • स्वेदन चार प्रकार का होता है – तप (सिकाई), जिसमें एक गर्म कपड़ा शरीर के प्रभावित अंग पर रखा जाता है। उपनाह, जिसमें चिकित्सकीय जड़ी-बूटी के मिश्रण से तैयार लेप शरीर पर लगाया जाता है। ऊष्मा, जिसमें संबंधित दोष के निवारण में उपयोगी जड़ी-बूटियों को उबालकर उसकी गर्म भाप दी जाती है। धारा, जिसमें गर्म द्रव्य या तेल को शरीर के ऊपर डाला जाता है।
       
  • सर्वांग क्षीरधारा
    • शिरोधारा, एक ऐसा आयुर्वेदिक उपचार है जिसमें दूध, तेल जैसे विभिन्न तरल पदार्थों और जड़ी-बूटियों का काढ़ा बनाकर लयबद्ध तरीके से सिर के ऊपर से डाला जाता है।
    • सर्वांग क्षीरधारा को तेल स्नान भी कहते हैं। इसमें उचित तेल को सिर और पूरे शरीर पर डाला जाता है।
       
  • वमन कर्म
    • यह पंचकर्म थेरेपी में से एक है जो पेट को साफ कर नाड़ियों और छाती से उल्टी के जरिए अमा और बलगम कोबाहर निकालती है।
    • इसमें मरीज को नमक का पानी, कुटज (कुर्चि) या मुलेठी और वच दिया जाता है। इसके बाद वमन चिकित्सा के प्रभाव को बढ़ाने के लिए पिप्पली, सेंधा नमक, आमलकी (आंवला), नीम, मदनफल जैसी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है।
    • वमन कर्म बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गो के लिए नहीं होता। इसके अलावा यह चिकित्सा हाई ब्लड प्रेशर, उल्टी, दिल, पेट से संबंधी बीमारियों, मोतियाबिंद, बढ़े हुए प्लीहा, कब्ज की समस्या और कमजोरी से ग्रस्त व्यक्ति पर नहीं करनी चाहिए।
    • इसका इस्तेमाल प्रमुख तौर पर कफ से संबंधित बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है।
    • वमन कर्म के बाद हाथ, मुंह और पैरों को अच्छी तरह से धोना और जड़ी-बूटियों के धुएं को सांस से अंदर लिया जाता है। इसके बाद पर्याप्त नींद या आराम करने की सलाह दी जाती है। नींद से उठने के बाद हाथ, चेहरा और पैर दोबारा धोते हैं।
       
  • विरेचन कर्म
    • पंचकर्म में विरेचन कर्म भी प्रमुख है और इसका बेहतरीन प्रभाव देखा जाता है।
    • विभिन्न रेचक जैसे कि सेन्ना, रुबर्ब या एलोवेरा देकर शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकाला जाता है।
    • विरेचन कर्म का इस्तेमाल मधुमेह के अलावा पेट के ट्यूमर, बवासीर, अल्सर, गठिया आदि केलिए भी किया जाता है।
    • अगर आपका बुखार हाल ही में ठीक हुआ है, कमजोर पाचन, मलाशय में छाले और दस्त की स्थिति में ये चिकित्सा नहीं लेनी चाहिए। इसके अलावा बच्चों, गर्भवती महिलाओं, वृद्ध और कमजोर व्यक्ति को भी विरेचन कर्म की सलाह नहीं दी जाती है।
    • विरेचन कर्म के बाद चावल और दाल का सूप दिया जाता है।
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गौ-मूत्र – आयुर्वेदिक उपचार | Desi Cow Gomutra Therapy | Cow Urine Therapy

आयुर्वेद के अनुसार देसी गाय का “गौ मूत्र” एक संजीवनी है| गौ-मूत्र एक अमृत के सामान है जो दीर्घ जीवन प्रदान करता है, पुनर्जीवन देता है, रोगों को भगा देता है, रोग प्रतिकारक शक्ति एवं शरीर की मांस-पेशियों को मज़बूत करता है|
आयुर्वेद के अनुसार यह शरीर में तीनों दोषों का संतुलन भी बनाता है और कीटनाशक की तरह भी काम करता है|

गौ-मूत्र का प्रयोग | Uses of Gomutra

  1. संसाधित किया हुआ गौ मूत्र अधिक प्रभावकारी प्रतिजैविक, रोगाणु रोधक (antiseptic), ज्वरनाशी (antipyretic), कवकरोधी (antifungal) और प्रतिजीवाणु (antibacterial) बन जाता है|
  2. ये एक जैविक टोनिक के सामान है| यह शरीर-प्रणाली में औषधि के सामान काम करता है और अन्य औषधि की क्षमताओं को भी बढ़ाता है|
  3. ये अन्य औषधियों के साथ, उनके प्रभाव को बढ़ाने के लिए भी ग्रहण किया जा सकता है|
    गौ-मूत्र कैंसर के उपचार के लिए भी एक बहुत अच्छी औषधि है | यह शरीर में सेल डिवीज़न इन्हिबिटोरी एक्टिविटी को बढ़ाता है और कैंसर के मरीज़ों के लिए बहुत लाभदायक है|
  4. आयुर्वेद ग्रंथों के अनुसार गौ-मूत्र विभिन्न जड़ी-बूटियों से परिपूर्ण है| यह आयुर्वेदिक औषधि गुर्दे, श्वसन और ह्रदय सम्बन्धी रोग, संक्रामक रोग (infections) और संधिशोथ (Arthritis), इत्यादि कई व्याधियों से मुक्ति दिलाता है|

गौ-मूत्र के लाभ | Benefits of Gomutra (Cow Urine)

देसी गाय के गौ मूत्र में कई उपयोगी तत्व पाए गए हैं, इसीलिए गौमूत्र के कई सारे फायदे है|गौमूत्र अर्क (गौमूत्र चिकित्सा) इन उपयोगी तत्वों के कारण इतनी प्रसिद्ध है|देसी गाय गौ मूत्र में जो मुख्य तत्व हैउनमें से कुछ का विवरण जानिए।

  1. यूरिया (Urea) : यूरिया मूत्र में पाया जाने वाला प्रधान तत्व है और प्रोटीन रस-प्रक्रिया का अंतिम उत्पाद है| ये शक्तिशाली प्रति जीवाणु कर्मक है|
  2. यूरिक एसिड (Uric acid): ये यूरिया जैसा ही है और इस में शक्तिशाली प्रति जीवाणु गुण हैं| इस के अतिरिक्त ये केंसर कर्ता तत्वों का नियंत्रण करने में मदद करते हैं|
  3. खनिज (Minerals): खाद्य पदार्थों से व्युत्पद धातु की तुलना मूत्र से धातु बड़ी सरलता से पुनः अवशोषित किये जा सकते हैं| संभवतः मूत्र में खाद्य पदार्थों से व्युत्पद अधिक विभिन्न प्रकार की धातुएं उपस्थित हैं| यदि उसे ऐसे ही छोड़ दिया जाए तो मूत्र पंकिल हो जाता है| यह इसलिये है क्योंकि जो एंजाइम मूत्र में होता है वह घुल कर अमोनिया में परिवर्तित हो जाता है, फिर मूत्र का स्वरुप काफी क्षार में होने के कारण उसमे बड़े खनिज घुलते नहीं है | इसलिये बासा मूत्र पंकिल जैसा दिखाई देता है | इसका यह अर्थ नहीं है कि मूत्र नष्ट हो गया | मूत्र जिसमे अमोनिकल विकार अधिक हो जब त्वचा पर लगाया जाये तो उसे सुन्दर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है |
  4. उरोकिनेज (Urokinase): यह जमे हुये रक्त को घोल देता है,ह्रदय विकार में सहायक है और रक्त संचालन में सुधार करता है |
  5. एपिथिल्यम विकास तत्व (Epithelium growth factor): क्षतिग्रस्त कोशिकाओं और ऊतक में यह सुधर लाता है और उन्हें पुनर्जीवित करता है|
  6. समूह प्रेरित तत्व(Colony stimulating factor): यह कोशिकाओं के विभाजन और उनके गुणन में प्रभावकारी होता है |
  7. हार्मोन विकास (Growth Hormone): यह विप्रभाव भिन्न जैवकृत्य जैसे प्रोटीन उत्पादन में बढ़ावा, उपास्थि विकास,वसा का घटक होना|
  8. एरीथ्रोपोटिन (Erythropoietin): रक्ताणु कोशिकाओं के उत्पादन में बढ़ावा |
  9. गोनाडोट्रोपिन (Gonadotropins): मासिक धर्म के चक्र को सामान्य करने में बढ़ावा और शुक्राणु उत्पादन |
  10. काल्लीकरीन (Kallikrein): काल्लीडीन को निकलना, बाह्य नसों में फैलाव रक्तचाप में कमी |
  11. ट्रिप्सिन निरोधक (Trypsin inhibitor):मांसपेशियों के अर्बुद की रोकथाम और उसे स्वस्थ करना |
  12. अलानटोइन (Allantoin): घाव और अर्बुद को स्वस्थ करना |
  13. कर्क रोग विरोधी तत्व (Anti cancer substance): निओप्लासटन विरोधी, एच -११ आयोडोल – एसेटिक अम्ल, डीरेकटिन, ३ मेथोक्सी इत्यादि किमोथेरेपीक औषधियों से अलग होते हैं जो सभी प्रकार के कोशिकाओं को हानि और नष्ट करते हैं | यह कर्क रोग के कोशिकाओं के गुणन को प्रभावकारी रूप से रोकता है और उन्हें सामान्य बना देता है |
  14. नाइट्रोजन (Nitrogen) : यह मूत्रवर्धक होता है और गुर्दे को स्वाभाविक रूप से उत्तेजित करता है |
  15. सल्फर (Sulphur) : यह आंत कि गति को बढाता है और रक्त को शुद्ध करता है |
  16. अमोनिया (Ammonia) : यह शरीर की कोशिकाओं और रक्त को सुस्वस्थ रखता है |
  17. तांबा (Copper) : यह अत्यधिक वसा को जमने में रोकधाम करता है |
  18. लोहा (Iron) : यह आरबीसी संख्या को बरकरार रखता है और ताकत को स्थिर करता है |
  19. फोस्फेट (Phosphate) : इसका लिथोट्रिपटिक कृत्य होता है |
  20. सोडियम (Sodium) : यह रक्त को शुद्ध करता है और अत्यधिक अम्ल के बनने में रोकथाम करता है |
  21. पोटाशियम (Potassium) : यह भूख बढाता है और मांसपेशियों में खिझाव को दूर करता है |
  22. मैंगनीज (Manganese) : यह जीवाणु विरोधी होता है और गैस और गैंगरीन में रहत देता है |
  23. कार्बोलिक अम्ल (Carbolic acid) : यह जीवाणु विरोधी होता है |
  24. कैल्सियम (Calcium) : यह रक्त को शुद्ध करता है और हड्डियों को पोषण देता है , रक्त के जमाव में सहायक|
  25. नमक (Salts) : यह जीवाणु विरोधी है और कोमा केटोएसीडोसिस की रोकथाम |
  26. विटामिन ए बी सी डी और ई (Vitamin A, B, C, D & E): अत्यधिक प्यास की रोकथाम और शक्ति और ताकत प्रदान करता है |
  27. लेक्टोस शुगर (Lactose Sugar): ह्रदय को मजबूत करना, अत्यधिक प्यास और चक्कर की रोकथाम |
  28. एंजाइम्स (Enzymes): प्रतिरक्षा में सुधार, पाचक रसों के स्रावन में बढ़ावा |
  29. पानी (Water) : शरीर के तापमान को नियंत्रित करना| और रक्त के द्रव को बरक़रार रखना |
  30. हिप्पुरिक अम्ल (Hippuric acid) : यह मूत्र के द्वारा दूषित पदार्थो का निष्कासन करता है |
  31. क्रीयटीनीन (Creatinine) : जीवाणु विरोधी|
  32. स्वमाक्षर (Swama Kshar): जीवाणु विरोधी, प्रतिरक्षा में सुधार, विषहर के जैसा कृत्य |
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खजूर खाने के फायदे | Benefits of Eating Dates

खजूर का पेड ३०-४० फीट तक बढता है। इसका तना शाखाविहीन कठोर, गोलाकार और खुरदरा होता है। इसकी उपज रेगीस्तान में, कम पानी और गर्म मौसम की जगह में होती है। नारीयल के समान इसके पेड के ऊपरी भाग में पत्तों के नीचे, घोसलों में खजूर लगते है। हरे कच्चे खजूर पकने के बाद भुरे तथा चिपचिपे होने लगते है। खजूर सुखने के बाद वह खारक कहलाती है।

प्राकृतिक शर्करा – ८५% मात्रा
प्रोटीन (Proteins)
खनिज पदार्थ (Minerals)
रेशे (Fibre)
विटामिन A, B और C (Vitamin A, B & C)
लोह (Iron)
कॅल्शियम (Calcium)
तांबा (Copper)
प्रचुर मात्रा में पोटॅशियम (Potassium)
अल्पमात्रा में सोडियम (Sodium)

आयुर्वेद के अनुसार खजूर मधुर,पौष्टिक,बलवर्धक,श्रमहारक, संतोष दिलाने वाला, पित्तनाशक, वीर्यवर्धक और शीतल गुणों वाला है। खजूर और खारक में विटामिन, प्रोटीन, रेशे, कार्बोहाइड्रेट और शर्करा होने की वजह से उसे पूर्ण आहार कहा जाता है। इसलिये उसे सभी उपवास में शरीरके संघर्षण की आपूर्ति करने के लिये उपयोग में लाया जाता है। ताजे, हरे खजूरका रायता बनाया जाता है। खजूर की चटनी बनती है। केक और पुडींग में खजूर का उपयोग किया जाता है। खारक सूखे मेंवे का हिस्सा है। खजूर के पत्तों से घर का छप्पर, झाडू, ब्रश आदि बनाया जाता है। इसकी तने इमारतों के आधार के तौर पर उपयोगी है। इसके रेशे रस्सिया बनाने के काम आते है।
खजूर में पाये जाने वालें तत्व

  1. विटामिन A से शरीर के अंग अच्छी तरह से विकसित होते है।
  2. विटामिन B दिल के लिये लाभदायी होता है। इससे दिल की मांसपेशियां मजबूत होती है। भूख बढती है।
  3. विटामिन C से शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति बढती है।
  4. यक्ष्मा के रोगी की दुर्बलता दूर कर उसे बल प्रदान करता है।
  5. खजूर धातू वर्धक तथा कफनाशक है।

शक्तिवर्धक खजूर के लाभ | Benefits of Dates

मधुर, पौष्टिक, बलवर्धक, श्रम हारक और संतोष दिलानेवाला खजूर शीतल गुण वाला है। सुखाये हुए खजूर को खारक कहा जाता है। खजूर के सारे गुण खारक में पाये जाते है।

रक्तक्षय, खून की कमी (Anemia)
खून में लोह की मात्रा कम हो जाने से थकान, घबराहट, दिल की धडकन बढना जैसी तकलीफ होती है। ऐसे में इक्कीस दिन लगातार ४-५ खजूर खाने चाहिये।
पुराने एनिमिया में, दिमागको खून की आपूर्ति कम होती है। जिसके कारण भूलजाना, चक्कर आना, अवसाद आदि लक्षण पाये जाय, तो छः महिने तक आहार में ७-८ खजूर लेंवे। इससे राहत मिलती है।

गठिया
दुर्बलता में पैर दर्द तथा गठिया में, एक कप गरम दुध में एक चम्मच गाय का घी और एक चम्मच खारक पावडर मिलाकर, गर्म ही पिलाये।

महिलाओं का पैरदर्द, कमर दर्द
ज्यादातर महिलाओं में पैर दर्द, कमर दर्द की शिकायत होती है। ऐसे में ५ खजूर आधा चम्मच मेंथी के साथ दो ग्लास पानी में उबालकर आधा होने तक उबालें। गुनगुना होने के बाद पिलाये। इस से राहत मिलती है।

कब्ज
अगर सुबह पेट साफ ना होता हो, तो ५-६ खजूर रात में पानी में भिगोये। सुबह अच्छी तरह खजूर रगडकर वह पानी पिलाये। खजूर रेचक है। पेट साफ करता है।

पाचन विकार
आतों में पाचन के लिये जरुरी विशिष्ट सूक्ष्म जीवों की संख्या स खजूर से बढती है। उससे पाचन क्रिया में सुधार होता है।

आंतव्रण (Ulcer), अम्लपित्त (Acidity)
खजूर पाचन क्रिया को सुधारता है, जिससे आंतव्रण, अम्लपित्त जैसी बिमारीयां ठीक होने में मदद होती है।

शरीर सौष्ठव प्राप्त करने के लिये
1. छोटे बच्चों की अच्छी सेहत के लिये हर रोज एक खजूर, दस ग्राम चावल के पानी में पीस लें। उसी में थोडा पानी मिलाकर दिन में तीन बार पिलाये।
2. बढती उम्र के बच्चों को खारक घी में भिगोकर खिलाये। नियमित तौर पर खजूर खाने से वजन बढने में एवं शरीर बलवान होने में मदद मिलती है। घी जोडोंको स्नेहन दिलाता है, तथा खारक हड्डीयों को मजबूत करता है। तेज बढता है।
3. ढलती उम्रके लोगों को खारक और गर्म दूध नियमित तौर पर लेंनेसे शक्ती बढती है। शरीर में नया खून का निर्माण होता रहता है

सावधानी

  1. मधुमेंह के रोगी इसका उपयोग ना करे।
  2. खजूर पाचन में भारी होता है, तथा इसके अति सेवन से दस्त हो सकते है।
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लहसुन के फायदे | Benefits of Garlic

लहसुन प्याज की जाति की वनस्पति है। इस वनस्पति में एक तीव्र गंध होती है जिसके कारन इसे एक औषधि का दर्जा दिया गया है। दुनियाभर में लहसुन का उपयोग मसाले, चटनी, सॉस, अचार तथा दवाओ के तौर पर किया जाता है।

लहसुन के औषधीय गुण

  1. सल्फर पदार्थ के होने के कारण लहसुन में एक तीव्र गंध आती है जिसके कारण इसमें रोगानुरोधक विशेषताएं भी होती है।
  2. लहसुन के तेल में गंध ज्यादा मात्रा में पाया जाता है इस, लिए इसमें औषधी तत्व होते है।
  3. लहसुन पुष्टि कर, वीर्यवर्धक, गर्म, पाचक, रेचक है।
  4. लहसुन मेधा शक्ति वर्धक है।

लहसुन के फायदे | Benefits of garlic

  1. सांस के विकार, दमा
    लहसुन दमा के रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक साबित हो सकता है। सांस आसानी से चले, इसलिये लहसुन की एक पंखुडी गर्म करके नमक के साथ खाये। दमा कम होने लिये एक प्याली गर्म पानी में दो चम्मच शहद और १० बूंद लहसुन का रस लीजिये। सोने से पूर्व लह्सून की ३ पंखुडीया दुध में उबालकर लेने से रात में दमा की तकलीफ काफी हद तक कम हो सकती है। दमा से आराम पाने के लिये एक लहसुन बारीक पीस कर १२० मिली माल्ट व्हिनेगरमें डाल कर उबाल लीजिये। ठंडा होने के बाद छानकर, उतनी ही मात्रा में शहद मिलाकर तैयार करें । यह रसायन २ चम्मच मेथी के अर्क के साथ सोने से पूर्व लें। न्युमोनिया में आराम पाने के लिये एक लिटर पानी में एक ग्राम लहसुन और २५० मिली दूध डालकर उबालें । एक चौथाई होने तक उबालते रहें । यह दूध दिन में तीन बार लें। क्षय रोग में आराम पाने के लिये लहसुन दूध में उबाल कर लेना चाहिये, ऐसा आयुर्वेद में बताया गया है।
  2. पाचन विकार
    लहसुन शरीर के विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है। पाचन रस का स्त्राव अच्छा करता है जिससे आंतो की सर्पिल हलचल में गती मिलती है। किसी भी पाचन विकार में लह्सून का दुध या पानी के साथ अर्क लिया जा सकता है। आन्तों के जीवाणू संक्रमण में लहसुन के इस्तेमाल से फायदा मिलता है। यह कृमी नाशक भी है और हर रोज लहसुन के दो गांठे खाने से अत्यंत लाभ प्राप्त होता है। कोलायटीस, पेचीश में लहसुन की एक कॅप्सूल काफी है। पेट की सभी रोगों से रहत पाने के लिए लहसुन एक हिस्सा, सैन्धा नमक और घी में भुना हुआ हिंग एक चौथाई हिस्सा, अद्रक के रस के साथ लेने से बहुत लाभ मिलता है।
  3. उच्च रक्त चाप
    लहसुन के उचित उपयोग से रक्त वाहिका के उपर आनेवाला दबाव और तनाव काम हो जाता है।नाड़ी और ह्रदय के कंपन की गति कम होती है। उच्च रक्त चाप के उपचार के लिए लहसुन तेल की छह बुंदे, चार चम्मच पानी के साथ दो बार ले। बढा हुआ रक्त चाप कम करने के लिये लहसून, पुदिना, जीरा, धनिया, काली मिर्च और सैंधा नमक से बनी हुई चटनी का सेवन करना चाहिये।
  4. हृदय रोग
    लहसुन के नियमित सेवन से रक्त वाहिका में जमा हुआ कोलॅस्टेरोल (Cholesterol) आसानी से निकलने में मदद होती है और दिल का दौरा आने की संभावना कम होती है।
    यदि किसी को दिल का दौरा आने की सम्भावना है तो उसे प्रतदिन 5-6 पंखुड़ियां अवश्य लेनी चाहिए। दूध से साथ लहसुन लेना भी सेहत के लिए काफी लाभदायक है।
  5. कैंसर
    कैंसर में लहसुन का नियमित सेवन जारी रखने से सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या बढती है तथा कैंसर की कोशिकाओं की बढत १३९ % से कम हो जाती है।
  6. त्वचा विकार
    कील और मुहासे कम होने के लिये चेहरे पर नियमित लहसुन लगाना चाहिए। त्वचा पर जहाँ दाद का प्रकोप हुआ है वहाँ लहसुन रगडने से वह खराब त्वचा जलकर ठीक हो जाती है। लहसुन रक्त को शुद्ध करता है तथा रक्त से विषेले तत्व को दूर करता है। जख्म और दाग दूर करने के लिये जिवाणुहीन साफ पानी में लहसुन रस 3:1 इस मात्रा में मिलाकर लगाये।

काली खांसी, रक्त दोष, गलझिल्ली, बहरापन, कुष्ठ रोग, गठीया, बवासीर, यकृत और पित्ताशय के विकार आदि रोगो के लिए भी लहसुन बहुत लाभदायक है। कामेच्छा कम होना, संभोग शक्ती कमजोर होने से लहसुन का उपयोग किया जा सकता है।

लहसुन की झाड़ी 2 – 3 फ़ीट ऊँची होती है। इसके जड़ के कंद में 5 से 35 लहसुन की पंखुडीया पायी जाती है। एक खास तरह के लह्सुनकी कंद में एक ही लह्सुन आता है जिसके ऊपर सफेद और पारदर्शक झिल्ली होती है।

सावधानी

  1. लहसुन गर्म और तेज गुणो वाला वनस्पति है। पित्त प्रकृती के लोगों को इसे वैद्य की सलाह से ही लेना चाहिए।
  2. गर्भावस्था में लहसुन न खाये।
  3. पित्त विकार में शक्कर के साथ, कफ विकार में शहद के साथ और वात विकार में घी के साथ ही लहसुन का सेवन करे।
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Benefits of Coriander | हरा धनिया के फायदे

शक्ति से भरपूर हरा धनिया

बारिक छोटे टूकडो में कटे हुए धनिया के पत्तों को आपके गरम सूप के कटोरे या अपनी पसंदीदा पावभाजी के ऊपर
छिड़कने से लुभावना होता है, इसमें बहुत सारे औषधीय गुण भी हैं। इसके पत्ते, उपजी, बीज और जड़ें, प्रत्येक एक अलग स्वाद प्रदान करते हैं।

हरा धनिया के औषधीय गुण | Goodness of Coriander in Hindi

चित्र के सुंदर पत्ते एक शक्तिशाली प्राकृतिक सफाई तत्व जैसे हैं। शरीर से भारी धातुओं और जहरीले तत्वों को साफ करने के लिए इसका प्रभावी ढंग से उपयोग होता हैं। धनिये का प्रयोग एलर्जी, मूत्राशय की जलन (मूत्राशय गुजरते समय जलन होती है) और त्वचा से संबंधीत एलर्जी की सूजन का इलाज करने के लिए किया जाता है। इससे जीवन शक्ति में सुधार होता है और दर्द घट जाता है। लोहतत्व और विटामिन ए, बी और सी से भरपूर, इसका भोजन में इस्तेमाल होने पर यह पौष्टिक मूल्य बढ़ाता है। भोजन की पाचनशक्ति बढ़ जाती है और भूख कम हो सकती है।

हरा धनिया के फायदे | Benefits of Coriander

  1. अतिसार और एलर्जी : 1 चम्मच धनिया रात भर पानी में भिगोएँ। उबालें, छाने और पी लें।
  2. सिरदर्द : कोमल धनिये के पत्तों के रस को माथे पर लगाए ।
  3. माहवारी में अतिरिक्त खून बह रहा है : दूध के साथ धनिया के बीज का सघन काढ़ा लें।
  4. आंख आना : धनिया के पत्तों के रस के साथ आंखें नियमित रूप से धोएं। धनिया के बीज का काढ़ा लाल और सूखी आँखों को आराम देता है।
  5. मुँहासे और काले मस्से : कोमल धनिये के पत्तों के रस में एक चुटकी हल्दी डालकर चेहरे पर लगाएँ और सूखने के बाद धो लें।
  6. जंतु का काटना : 6-7 चम्मच धनिये के पत्ते का रस पी लें। और पेस्ट को काटी हुई जगह पर लगाएँ।
  7. मुंह के अल्सर: धनिया के बीज काढ़ा पीएं और इसके साथ कुल्ला करें।
  8. मुंह से दुर्गंध (बुरा सांस) : निश्चित समयांतर पर धनिये के बीज का चूर्ण ले।
  9. त्वचा के फफोले: बीज के काढ़े को पी लें। पानी में 1 चम्मच धनिये के बीज को उबालें और इसके पेस्ट को प्रभावित क्षेत्र पर लगाएं।
  10. मुंह का सूखापन, पेट में दर्द, बवासीर : धनिया के बीज का काढ़ा पीएं।
  11. नकसीर : धनिये के पत्ते का रस नाक में लगाएँ।
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Ginger | अदरक

अदरक स्वाद में तीखी होती है। अदरक पाचक, चिड़चिड़ापन दूर करने वाली एक अध्भुत औषधि है। यह पीड़ानाशक और स्वादिष्ट होती है तथा वायू और कफ का नाश करती है। अदरक जमीन के नीचे पाई जानेवाली, ढाई से तीन फीट उचाई की झाडी की,पीले रंग की जड़ होती है। अदरक लंबे समय तक उपयोगी बनी रहे उस के लिये उसे धूप में सुखाया जाता है। कुछ जगह दूध में डूबोकर सूखने के बाद उसका सौन्ठ बनाया जाता है। सौन्ठ अदरक से भी ज्यादा गरम होती है। सौन्ठ से तेल निकाला जाता है। अगर आप अदरक को लम्बे समय तक संभल कर रखना चाहते हैं, तो उसे गीली मिट्टी में भी दबा कर रखा जा सकता है। मसाले और दवा के तौर पर अदरक को दुनियाभर में उपयोग किया जाता है। अदरक दवा के रूप में बहुत ही परिणामकारक सिद्ध हुआ है, इसलिये उसे ‘महाऔषधी’ कहा जाता है।

१० ग्राम ताजे अदरक के रस में पदार्थ

पानी ( Water) – ८०.९%वसा (Fats) – ०.९%
कार्बोहायड्रेड्स (Carbohydrates) – १२.३%कॅल्शियम (Calcium) – २ मि.ग्रॅ.
रेशा (Fibre) – २.४%फोस्फरस (Phosphorus) – ०.६० मि.ग्रॅ.
प्रोटीन्स (Proteins) – २.३%लोह (Iron) – ०.२६ मि.ग्रॅ.
खनिज (Minerals) – १.२%विटामिन सी (Vitamin C) – ०.६ मि.ग्रॅ.

अदरक के फायदे
पाचन विकार के लिए: पाचन विकारों में अदरक मदद कर सकता है.
1. अपच (Indigestion), खानेकी अनिच्छा, पेट में गैस होना, उल्टी होना, कब्ज होना आदि के लिये।
2. एसिडिटी के लिए बहुत फायदेमंद।
3. जी मचलना, छाती में जलन, खट्टी डकार आदि के लिये।
4. खाना खाने के पूर्व अदरक का टुकड़ा नमक के साथ चबा चबाकर खाये।
5. आधा चम्मच अदरक का रस, सम मात्रा में शहद और नीम्बू का रस मिलाकर दिन में तीन बार ले।
6. अदरक, सैन्धा नमक, काली मिर्च और पुदीने की चटनी भोजन के साथ ले।
7. सुबह शाम खाली पेट अदरक का छोटा सा टुकड़ा और उतना ही नमक चबा चबा कर उसे निगल ले। आधे घंटे तक कुछ ना खाये पिये। रात को सोने से पूर्व ठंडा दुध शक्कर मिलाकर पिये। यह उपाय इक्कीस दिनो तक करे। पुरानी पित्त की तकलीफ भी दूर हो जाती है।

सांस विकार के लिए
1. सर्दी, जुकाम, पुरानी काली खांसी, क्षयरोग, कफ, दमा आदि के लिये।
2. अदरक का रस शहद के साथ दिन में तीन बार लें।
3. अदरक के टुकडे पानी में उबालकर, जरूरत के अनुपात में शक्कर मिला कर वह पानी गरम करके पीना चाहिये। अदरक की चाय लीजिये।
4. अदरक का रस दुगने अनुपात में मिश्री या गुड के साथ मिलाकर चटवाये।
5. सौन्ठ तथा उससे चार गुना मिश्री का काढा लेने से कफ पतला होने में मदद होती है।

स्त्री रोग के लिए
स्त्रीरोग संबंधी समस्याओं को हल करने के लिए अदरक के प्रयोग।
1. अनियमित मासिक स्त्राव, पेट दर्द के लिये अदरक ड़ालकर उबाला हुआ पानी दिन में तीन बार लीजिये।
2. प्रसव के बाद होनेवाली इंद्रिय शिथिलता के लिये सौन्ठ पाक दिया जाता है।

वेदना शामक
वेदना कम करने के लिए अदरक के प्रयोग
1. अदरक को पानी के साथ पीसकर वह लेप माथे पर या जहां दर्द हो रहा हो वहा लगाये। ताज़ा जखमों पर ना लगाये।
2. दांत के दर्द में, अदरक का टुकड़ा दांत में पकड कर रखें।
3. कान के दर्द में, दो बूंद अदरक का रस कान में ड़ाले।
4. गठीया में कद्दूकस किया हुआ अदरक गरम करके लगाये।

आयुर्वेद के अनुसार शरीर में अनेक मार्ग है जिन्हे ‘स्त्रोतज’ कहां जाता है।अदरक की मदद से उन मार्गो का अवरोध दूर किया जा सकता है।
सावधानी:
अदरक उष्ण गुणधर्मी है, इसलिये गर्मी में कम उपयोग किया जाये।
उच्च रक्त चाप, अल्सर, रक्तपित्त आदि में अदरक का उपयोग ना करे।

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दालचीनी के फायदे | Health Benefits of Cinnamon

दालचीनी के फायदे | Health Benefits of Cinnamon in Hindi

दालचीनी का पेड हमेशा हराभरा तथा छोटी झाड़ी जैसा होता है। उसके तने की छाल चुनकर सुखाई जाती है। उनका आकार कवेलू जैसा गोलाकार, जाडा, मुलायम तथा भुरे लाल रंग का होता है। दालचीनी के पेड़ से हमेशा सुगंध आती है। इसका उपयोग मसालो और दवा के तौर पर किया जाता है। इसका तेल भी निकाला जा सकता है। दालचीनी के पेड़ को पत्तों का उपयोग खाने में मसाले की तरह किया जाता है। इन्हे तेजपत्ता भी कहा जाता है।

पाचन में सुधार लाने और जठर संबधी विकारों के लिए इन 4 अलग-अलग तरीकों से दालचीनी का उपयोग कर सकते है।

अपच, पेटदर्द और सीने में जलन महसूस होने पर आप दालचीनी, सौन्ठ, जीरा और इलायची सम मात्रा में लेकर पीसकर गरम पानी के साथ ले सकते हैं।

दालचीनी, काली मिर्च पावडर और शहद आदि मिलाकर भोजन के बाद लेने से पेट अफारा नहीं होता।

दालचीनी से जी मचलना, उल्टी और जुलाब रुकते है।

कब्ज और गैस की समस्या कम करने के लिये दालचीनी के पत्तों का चूर्ण और काढा बना कर लिया जाता है।

  • वीर्य वृद्धि के लिये दालचीनी पाउडर सुबह शाम गुनगुने दूध के साथ ले।
  • ठंड की वजह से सिरदर्द हो तो दालचीनी पानी के साथ पीसकर सिरपर लगाये।
  • मुह की दुर्गंध और दांत की दवा में दालचीनी का उपयोग किया जाता है।
  • मुहांसे कम करने के लिये दालचीनी का चूर्ण नींबू के रस में मिलाकर लगाये।
  • खसरा निवारक के तौर पर दालचीनी का उपयोग किया जाता है।

दालचीनी के पदार्थ | Ingredients in Cinnamon

प्रोटीन | Protienथायामीन |Thayamin
कार्बोहायड्रेट |Carbohydrateरिबोफ्लेविन |Reboflewin/td>
फॉस्फरस |Phosphorusनिआसीन | Niasin
सोडियम |Sodiumजीवनसत्व ‘अ’ & ‘क’ | Vitamin A & C
पोटॅशियम | Potassiumनमी & एश

दालचीनी स्वाद में तिखी मिठी होती है। दालचीनी ऊष्ण, दीपन, पाचक, मुत्रल, कफनाशक, स्तंभक गुणधर्मो वाली है। मन की बेचैनी कम करती है। यकृत के कार्य में सुधार लाता है। स्मरण शक्ती बढाती है।

सावधानी | Precautions to take while using Dalchini

  • दालचीनी उष्ण गुणधर्म की है, इसलिये गर्मी के दिनोमें कम उपयोग करें।
  • दालचीनीसे पित्त बढ सकता है।
  • ऊष्ण प्रकृती के लोग चिकित्सक से सलाह ले।