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ऐलोवेरा के फायदे – 2

  • एलोवेरा को रक्त शोधन, पाचन क्रिया के लिए काफी गुणकारी भी माना जाता है।
  • यह इसलिए भी फायदेमंद है, क्योंकि यह केवल एक पक्ष की अवधि के दौरान ही अपना असर दिखाने में सक्षम है।
  • नियमित रूप से एलोवेरा जूस को पीने से शरीर में नयी ऊर्जा का संचार होता है।
  • एलोवेरा जूस के सेवन से त्वचा में निखार आता है।
  • इसके सेवन से आपकी त्वचा लंबे समय तक जवां लगती है।
  • इसको पीने से या बालों में लगाने से चमक आती है, रूसी दूर हो जाती है और टेक्सचर भी अच्छा हो जाता है।
  • एलोवेरा में बैक्टीरिया और फंगस से लड़ने की क्षमता होती है। ये डैंड्रफ दूर करने में काफी उपयोगी है।
  • इसके एंटी फंगल गुणों के कारण यह त्वचा पर फंगल इन्फेक्शन जल्दी ठीक भी कर देता है।
  • एलोवेरा का कोई भी अतिरिक्त प्रभाव नहीं होता। शरीर में रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ाकर खून की कमी को पूरा करता है।
  • इसका नियमित उपयोग करके लंबी उम्र तक स्वस्थ रहा जा सकता है।
  • एलोवेरा जूस के नियमित इस्तेमाल से वजन बड़ी आसानी से घट जाता है।
  • आप घरेलू फेसवास बना कर भी इसका उपयोग कर सकते हैं।
  • एलोवेरा के रस में हल्दी मिलाकर सिर में लगाने से सिर दर्द में आराम पहुँचता है।
  • एलोवेरा का जूस पीने से पीलिया में भी फायदा पहुँचता है।
  • गर्भावस्था के दौरान पेट पर आने वाले स्ट्रेच मार्क्स दूर करने में एलोवेरा लाभकारी है।
  • एलोवेरा में मौजूद एंजाइम ढीली पड़ चुकी त्वचा को हटाकर नयी त्वचा को नमी से युक्त रखते है।
  • आंवला और जामुन के साथ एलोवेरा का उपयोग करने से ये आंखों का भी बचाव करता है और साथ ही साथ बालों को मजबूती मिलती है।
  • शेव करने के बाद अगर चेहरा कट जाता है, तो ऐसे में एलोवेरा का जेल ऑफ्टर शेव की तरह भी काम करता है।
  • इसका एक सनस्क्रीन की तरह इस्तेमाल हो सकता है।
  • इसके एंटी ऑक्सीडेंट नमी को बनाए रखने में मदद करते हैं।
  • इसका इस्तेमाल मोइश्चराइजर के निर्माण में किया जाता है।
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ऐलोवेरा के फायदे

हर व्यक्ति एलोवेरा के फायदे के बारे में जानता है। ये औषीय पौधा है जिसके कई फायदे हैं। हम जिन फायदों के बारे में आज आपको बताएँगे उनके बारे में कम लोगों को ही मालूम होगा। आयुर्वेद में इसे संजीवनी पोधा भी कहा जाता है। पूरे विश्व में इसकी 400 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से सिर्फ 4 प्रजातियां हीं हमें लाभ पहुंचाने में कारगर होती हैं।

एलोवेरा के फायदे :

  • इसका प्रयोग पौष्टिक आहार के रूप में होता है।
  • एक छोटे प्याले के सेवन से दिन-भर शरीर में ताकत बनी रहती है।
  • यह बवासीर रोग में आराम पहुँचाती है।
  • मधुमेह के रोगियों के लिए फ़ायदेमंद है।
  • गर्भाशय के रोगों में यह चमत्कारी है।
  • पेट से संबन्धित समस्याओं में में भी फायदेमंद है।
  • जोड़ों के दर्द में आराम पहुँचा देता है।
  • त्वचा की समस्याएँ जैसे मुंहासे, रूखी त्वचा, झुर्रियों, चेहरे के दाग, आंखों के काले घेरों, फटी एड़ियों के लिए यह लाभप्रद है।
  • यह खून की कमी को दूर करता है
  • शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
  • जलने, कटने पर, अंदरूनी चोटों पर एलोवेरा अपने एंटी बैक्टेरिया और एंटी फंगल गुण के कारण घाव को जल्दी भरता है।
  • यह रक्त में शुगर लेवेल को नियंत्रित रखता है।
  • यह मच्छर से त्वचा को सुरक्षित रखता है, इसमें प्राकृतिक रूप से मॉस्किटो रिपेलेंट गुण मौजूद होते हैं।
  • एलोवेरा का इस्तेमाल जैल, बॉडी लोशन, हेयर जैल, स्किन जैल, शैंपू, साबुन, फेशियल फोम, हेयर स्पा इत्यादि के निर्माण में भी किया जाता है।
  • एलोवेरा जेल या रस में मेहंदी में मिलाकर बालों में लगाने से बाल चमकदार व स्वस्थ होंगे।
  • एलोवेरा के रस में नारियल के तेल की थोड़ी सी मात्रा मिलाकर कोहनी, घुटने व एड़ियों पर लगाकर धोने से इन जगहों पर पड़ने वाला कालापन दूर होता है।
  • इसकी पत्तियों का सेवन करने से पेट में कब्ज की समस्या से राहत मिलती है।
  • गुलाबजल में एलोवेरा का रस मिलाकर त्वचा पर लगाने से त्वचा की नमी लौटती है।
  • एलोवेरा के गूदे में मुलतानी मिट्टी या चंदन पावडर मिलाकर लगाने से त्वचा के कील-मुंहासे आदि लंबे समय के लिए मिट जाते हैं।
  • यह पौधा कम पानी और कम उर्वरक मिट्टी में भी आसानी से पनप सकता है, इसलिए आप इसे बड़ी आसानी से ही अपने घर में छोटे गमलों में लगा सकते हैं।
  • यह जलने कटने के घावों पर मरहम की तरह काम करने के साथ साथ उनके निशानों पर भी काम करता है।

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डायबिटीज (मधुमेह) का आयुर्वेदिक उपचार

  • उद्वर्तन
    • इस विधि में विशेष औषधीय पाउडर से मालिश की जाती है जिसमें प्रभावित व्यक्ति के सारे दोषों को संतुलित करने वाली जड़ी-बूटियों के मिश्रण का इस्तेमाल किया जाता है।
    • पाउडर को उपचार से पहले गर्म किया जाता है। उसके बाद इससे प्रभावित हिस्से की नीचे से ऊपर की ओर गहराई से मालिश की जाती है।
    • यह प्रक्रिया 45 से 60 मिनट तक चलती है। इसके बाद मरीज आधा घंटा आराम करके स्नान कर सकता है।
    • यह कफ दोष और शरीर में जमा अतिरिक्त चर्बी को कम करके मधुमेह का उपचार करती है।
       
  • धान्य अम्ल धारा
    • इसमें गर्म औषधीय तरल को प्रभावित हिस्से या पूरे शरीर पर डाला जाता है। धारा चिकित्सा दो प्रकार की होती है- परिषेक (शरीर के किसी विशेष भाग पर औषधीय तरल या तेल डालना) और अवगाहन (औषधीय काढ़े से भरे टब में बैठना)।
    • धान्य अम्ल में धान्य (अनाज) और अम्ल (सिरका) से गुनगुना औषधीय तरल तैयार किया जाता है। यह कफ और वात दोष को संतुलित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
       
  • सर्वाग अभ्यंग और स्वेदन
    • सर्वाग अभ्यंग तेल को पूरे शरीर पर डालने और मसाज करने की एक प्रक्रिया है। यह शरीर की लसिका प्रणाली को उत्तेजित करती है, जो कि कोशिकाओं को पोषण की आपूर्ति और शरीर से जहरीले तत्व निकालने का काम करती है।
    • तेल मालिश के बाद स्वेदन (पसीना लेन की विधि) के जरिए शरीर से अमा (विषैले पदार्थ) को प्रभावी तरीके से पूरी तरह से बाहर करने का काम किया जाता है। 
    • स्वेदन से शरीर की सभी नाड़ियां खुल जाती हैं और विषैले तत्व रक्त से निकलकर जठरांत्र मार्ग में आ जाते हैं। यहां से विषाक्त पदार्थों को आसानी से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
    • स्वेदन चार प्रकार का होता है – तप (सिकाई), जिसमें एक गर्म कपड़ा शरीर के प्रभावित अंग पर रखा जाता है। उपनाह, जिसमें चिकित्सकीय जड़ी-बूटी के मिश्रण से तैयार लेप शरीर पर लगाया जाता है। ऊष्मा, जिसमें संबंधित दोष के निवारण में उपयोगी जड़ी-बूटियों को उबालकर उसकी गर्म भाप दी जाती है। धारा, जिसमें गर्म द्रव्य या तेल को शरीर के ऊपर डाला जाता है।
       
  • सर्वांग क्षीरधारा
    • शिरोधारा, एक ऐसा आयुर्वेदिक उपचार है जिसमें दूध, तेल जैसे विभिन्न तरल पदार्थों और जड़ी-बूटियों का काढ़ा बनाकर लयबद्ध तरीके से सिर के ऊपर से डाला जाता है।
    • सर्वांग क्षीरधारा को तेल स्नान भी कहते हैं। इसमें उचित तेल को सिर और पूरे शरीर पर डाला जाता है।
       
  • वमन कर्म
    • यह पंचकर्म थेरेपी में से एक है जो पेट को साफ कर नाड़ियों और छाती से उल्टी के जरिए अमा और बलगम कोबाहर निकालती है।
    • इसमें मरीज को नमक का पानी, कुटज (कुर्चि) या मुलेठी और वच दिया जाता है। इसके बाद वमन चिकित्सा के प्रभाव को बढ़ाने के लिए पिप्पली, सेंधा नमक, आमलकी (आंवला), नीम, मदनफल जैसी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है।
    • वमन कर्म बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गो के लिए नहीं होता। इसके अलावा यह चिकित्सा हाई ब्लड प्रेशर, उल्टी, दिल, पेट से संबंधी बीमारियों, मोतियाबिंद, बढ़े हुए प्लीहा, कब्ज की समस्या और कमजोरी से ग्रस्त व्यक्ति पर नहीं करनी चाहिए।
    • इसका इस्तेमाल प्रमुख तौर पर कफ से संबंधित बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है।
    • वमन कर्म के बाद हाथ, मुंह और पैरों को अच्छी तरह से धोना और जड़ी-बूटियों के धुएं को सांस से अंदर लिया जाता है। इसके बाद पर्याप्त नींद या आराम करने की सलाह दी जाती है। नींद से उठने के बाद हाथ, चेहरा और पैर दोबारा धोते हैं।
       
  • विरेचन कर्म
    • पंचकर्म में विरेचन कर्म भी प्रमुख है और इसका बेहतरीन प्रभाव देखा जाता है।
    • विभिन्न रेचक जैसे कि सेन्ना, रुबर्ब या एलोवेरा देकर शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकाला जाता है।
    • विरेचन कर्म का इस्तेमाल मधुमेह के अलावा पेट के ट्यूमर, बवासीर, अल्सर, गठिया आदि केलिए भी किया जाता है।
    • अगर आपका बुखार हाल ही में ठीक हुआ है, कमजोर पाचन, मलाशय में छाले और दस्त की स्थिति में ये चिकित्सा नहीं लेनी चाहिए। इसके अलावा बच्चों, गर्भवती महिलाओं, वृद्ध और कमजोर व्यक्ति को भी विरेचन कर्म की सलाह नहीं दी जाती है।
    • विरेचन कर्म के बाद चावल और दाल का सूप दिया जाता है।